"माँ बनने का दूसरा दिन – एक नई सुबह, एक नया डर"
माँ बनने का पहला दिन तो जैसे एक सपना था —
लोग आए, फूल आए, फोटो लिए गए...
लेकिन दूसरे दिन, जब सब चला गया,
तो कमरे में सिर्फ मैं और मेरा बच्चा रह गए।
दूध पिलाने में डर,
उसकी रोने की आवाज़ से घबराहट,
और दिल में बार-बार उठता एक सवाल —
"क्या मैं ये सब कर पाऊँगी?"
फिर भी, जब उस छोटे से हाथ ने मेरी उंगली थामी,
मुझे लगा – मैं अकेली नहीं हूँ।
उसके साथ मैं भी सीख रही हूँ...
एक नई माँ, हर दिन थोड़ी और मजबूत।
🌟 Conclusion – "एक नई शुरुआत हर दिन होती है"
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